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भारतीय मीडिया विशेषकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की विशेषता है – नित नए सनसनीखेज नारों को प्रचारित करना। इस कड़ी में नवीनतम गढ़ना है -हिन्दू आतंकवाद। क्योंकि इस शब्द की संरचना इस्लामी आतंकवाद के संदर्भ में हुई थी अतएव इस्लामी नेतृत्व संसार भर में प्रचार करते रहे कि इस्लाम में आतंक हराम है, अतएव जो भी इस कर्म में लीन है वे इस्लामी मतावलम्बी नहीं है। भारत में मुल्लाओं की महासभा”अखिल भरतीय आतंक-विरोध्-दारुल उलूम-देवबंद के तत्त्वावधान में हुई जिसमें आतंक की भर्त्सना की गई। देवबंद ने तो पुष्ट करने हेतु फतवा तक घोषित किया।

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यदि इस्लाम शांति है तो भारत में पिछले हजार सालो से खून खराबे का दोषी कौन है??

किन्तु विश्वभर में अभी इस्लामी आतंकवाद शब्द का प्रयोग हो रहा है। सत्य है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते। पहले इसी विचारधरा को प्रचारित किया गया किन्तु बात नहीं बनती देख सेकुलर राजनेता और मीडिया ने नया फार्मूला गढ़ा। हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद। साधु-संत या साध्वी इसमें लपेटे गए। हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ने के दो लक्ष्य थे –

पहला मुस्लिम केन्द्रित आतंक से ध्यान हटाना और निष्क्रियता को छिपाना। इस हेतु एक नया नारा निर्मित हुआ – ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता । परिणाम अपेक्षित ही रहा। बस यही प्रचारित होता गया। वाद-विवाद में एकाध् अपवाद को छोड़कर सभी भागीदार इसी वाक्य को दोहराते रहे हैं। कुछ लोग इसे हिन्दू-प्रतिक्रिया बताते हैं।

विस्मय होता है कि इतने महत्त्वपूर्ण विषय पर भी आतंकवाद को समझने-समझाने हेतु उसकी परिभाषा जानने की आवश्यकता नही समझी गई। यहाँ तक कि विपक्ष के नेता आडवाणी और सरसंघ चालक श्री सुदर्शन सरीखे लोग भी इन्हीं घिसे-घिसाए शब्दों को ही दोहरा रहे हैं। हमारी समझ से किसी शब्द में ‘वाद’ जोड़ने पर उस क्रिया की विचारधरा का बोध् होता है।

मात्र आतंक शब्द किसी व्यक्ति द्वारा क्षणिक आवेश में किए गए कर्म को निरूपित करता है या मनचले अथवा विक्षिप्त व्यक्ति का कर्म हो सकता है – जैसे एक विक्षिप्त व्यक्ति युवतियों के सिर पर प्रहार करके भयभीत करता रहा या कोई छात्रा आवेश या क्रोध्वश सभी छात्रों पर गोली चला देता है। सो आतंक स्वयं में उस कर्म का लक्ष्य है किन्तु वाद जुड़ने से किसी विचारधरा का बोध् होता है जैसे नक्सलवादी आतंक अथवा माओवादी आतंक शब्द से किए गए आतंक के पीछे हिंसक मार्क्सवादी विचार का होना बताता है। अतएव नक्सलवादी आतंकवाद शब्द से कर्म तो भय का वातावरण (आतंक) निर्माण करना है किन्तु लक्ष्य है मार्क्सवादी राज्यव्यवस्था की स्थापना।

उदाहरण है हमारे उत्तर में स्थित नेपाल राज्य, जहाँ माओवादी आतंक के आधर पर राजशाही को समाप्त किया गया। नक्सलवाद विशु) भारतीय गढ़ना है। इसी प्रकार विश्व में इस्लामिक आतंकवाद शब्द गढ़ा गया। यह पाश्चात्य देशों में जहाँ इस्लाम के जेहादी गुटों ने इन देशों में आतंक मचाया, गढ़ा और प्रचारित किया गया। भारत, जो लगभग दो दशकों से इस आतंक का शिकार रहा तथा जहाँ इस अवधि में ७०,००० से अधिक भारतवासी इस आतंक से पीड़ित हुए वहाँ इस्लामी आतंकवाद शब्द का उपयोग अपेक्षाकृत नया है।

आतंकवाद की परिभाषाओं की खोज से पता चला कि विश्व में लगभग १०० प्रचलित परिभाषाओं में से यू.के. कानून २००० में दी गई परिभाषा सर्वमान्य है। इसके अनुसार – ‘आतंकवाद से अभिप्राय मजहबी भावनाओं के दुरुपयोग के द्वारा भयाक्रान्त करने वाला कर्म जहाँ, कर्म से अभिप्राय है हिंसा अथवा संपत्ति की हानि, जो राज्य या किसी वर्ग अथवा जनसमुदाय या उसके किसी विशिष्ट वर्ग के प्रति हो, तथा कर्म का लक्ष्य हो राजनीतिक, मजहबी अथवा वैचारिक परिवर्तन को बढ़ावा देना। हमारी ऊपर दी गई अवधारणा इसके अनुरूप ही है।

जिस तरह नेपाल में माओवादी आतंकवाद का लक्ष्य रहा माओवादी राज्य की स्थापना, उसी तरह इस्लामी आतंकवाद का लक्ष्य भी इस्लामी साम्राज्य अथवा शरियत का राज्य स्थापित करना है। भारत में आतंकवादी संगठन जैसे जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तोएबा, हिन्दुस्तानी मुजाहिद्दीन और सिम्मी आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी लेते रहे हैं। उनके द्वारा भेजे गए ई-मेल से इस आतंक को कुरान की आयतों के अनुरूप बताते हैं। शरियत का राज्य स्थापित करने के ध्येय का आधर इस्लाम की किताब कुरान और हदीसों सुन्ना में मिल जाता है। प्रथम – अल्लाह विश्व के निवासियों को दो वर्गों में विभाजित करता है – आस्थावान्‌ और गैर आस्थावान्‌।

इस्लाम और पैगम्बर पर विश्वास करने वाले आस्थावान्‌ और अन्य को ‘पुस्तक वाले’ और कापिफर दो वर्गों में रखा गया है। काफिरों से निरंतर संघर्ष आस्थावान्‌ का अनिवार्य कर्तव्य बताया गया है। यह संघर्ष स्वयं में अंत नहीं है वरन केवल अल्लाह की ही सर्वत्रा मान्यता तथा उसके आदेशानुकूल साम्राज्य स्थापना के मार्ग के प्रति हृदय में घृणा उत्पन्न करना चाहे वह कितना भी करीबी हो। दूसरा चरण उनके लिए है जो युद्ध कर नहीं सकते।

उन्हें अल्लाह के मार्ग में युद्ध करने वालों की मन और धन से सहायता करनी है। जो विचारक और लेखक हों उनका भाषण और लेखन द्वारा सहायक बनना और जो युवा एवं हृष्ट-पुष्ट तथा युद्ध करने योग्य हों उन्हें सक्रिय युद्ध में भाग लेना।

 रेगिस्तानी जीवन में अनेक कमियां होती हैं। उनके निदान हेतु इस अंतिम श्रेणी में युवाओं को आकृष्ट करने हेतु अत्यंत लुभावने प्रलोभन दिए गए हैं। युवाओं की उभरती कामवासना की पूर्ति हेतु युद्ध में पराजित समुदाय के धन, महिलाओं का अपहरण और दास-दासियाँ रखना जायज ठहराया गया है।

शहीद होने पर तुरंत जन्नत और वहाँ ७० हूरों का प्रलोभन दिया गया है। साधरण मृत्यु होने पर निर्णय के दिन (डे ऑफ जजमेंट) तक कब्र में पड़े रहना होता है। किन्तु अल्लाह के मार्ग में शहीद को तुरंत जन्नत का प्रावधन है अर्थात्‌ जिहाद में भाग लेकर शहीद हो जाना, मात्रा एक पुण्य ही नहीं है वह जन्नत के सुख भोगने का मार्ग भी है।

आतंक इस विचारधरा को अमली जामा पहनाता है। हमारी समझ से इस्लामी आतंकवाद मजहबहीन नहीं है। अपितु पूर्ण रूप से कट्टर मजहबी है। इसकी पुष्टि पूर्व में वर्णित आंतक-विरोध् के नाम से महासभा में उलेमाओं द्वारा दी गई राय है कि मुस्लिम पूर्ण विश्वास के साथ जीवन शरियत और शिक्षानुरूप बिताएं। इस सभा में की गई घोषणा का अंतिम वाक्य है – ‘समस्त संसार को इस्लामिक मानना चाहिए’।

इसके अनुसार इस्लामी आतंकवाद एक सत्य है। इसके विपरीत हिन्दू धर्म ग्रंथों में सर्वत्र ‘वसुधैव कुटम्बकम्‌’ की अवधरणा है, ‘सर्वभवन्तु सुखिनः’ की कामना है। यही कारण रहा है कि पश्चिम में अफगानिस्तान से पूर्व में सुवर्ण भूमि (ब्रह्‌मा), श्याम, काम्बोज, चम्पा, मलाया, सुमात्रा, वरुण द्वीप, यव द्वीप एवं बाली तक फैले विस्तृत क्षेत्रा में कहीं भी, कभी भी हिन्दुओं ने न हमलाकर किसी देश का अधिग्रहण किया और न ही किसी राज्य में आतंक फैलाया।

हिन्दू राजे-रजवाड़े आपस में लड़ते रहे, किन्तु कभी भी किसी हिन्दू राजा ने विजित राज्य में इस्लामी हमलावरों की तरह विधर्मी जनता का र्ध्मान्तरण अन्यथा कत्लेआम अथवा लूटपाट करने का आदेश नहीं दिया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमलावरों ने इसे इस्लामी कर्म बताया। इस संदर्भ से स्पष्ट है कि आतंक इस्लाम का पोषक बनाया गया। हिन्दू दर्शन में इसके लिए कोई स्थान नहीं। गाँधी जी ने हिन्दुओं को भयमुक्त होने हेतु अपनी पंरपरानुसार कार्य करने की राय दी है।

हिन्दुओं की परंपरा के दृष्टांत महाभारत काल से लें तो वहाँ भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के दौरान दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी जंघा पर बैठने को कहने के अपराध् में भीम ने युद्ध की रीति-नीति की अन्‌देखी कर उसकी जंघाओं में प्रहार कर उसका प्राणान्त किया था। कर्ण ने युद्धनीति के विपरीत अभिमन्यु को सात महारथियों के साथ घेर कर युद्ध में उसे मार गिराया तो प्रत्युत्तर में अर्जुन ने कर्ण पर उस समय प्रहार किया जब वह ध्ंसे रथ के पहिए को उठाने हेतु शस्त्रहीन था।

विशेष बात यह है कि स्वयं भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्ण के दुष्कर्मों की याद दिलाई थी। सो हिन्दू परंपरा है -सठंप्रति साठ्यम्‌ कुर्यात्‌। दुष्टता का उत्तर उसे सहना नहीं है, अपितु उसका हनन ही है। सहना तो कायरता है। इस कर्म को हम ऊपर दी गई आतंकवाद की परिभाषा में नहीं रख सकते क्योंकि यह विशिष्ट कर्म का अनिवार्य प्रतिशोध् मात्रा है। अतएव तीसरी शर्त पूरी होती।

हमारी विवेचना का निष्कर्ष यह है कि इस्लामी आतंकवाद एक सत्य है, हिन्दू आतंकवाद कुत्सित भावना से गढ़ा दुष्प्रचार है