Tags

, , , , , , , , ,


“कुरआन अलाह की किताब है ,अकाट्य है,यह जब से नाजिल हुई इसमे कई बदलाव नहीं हुआ,इसमे कुछ भी घटाना या बढ़ाना नामुमकिन है ,नुजूल से लेकर आजतक कुरआन वही है जो नबी के वक्त थी “मुसलमान यही दावा करते हैं .

इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमे प्रश्न करने,या तर्क करने की अनुमति नहीं है.इसलिए मुसलमान कट्टर,असहिष्णु ,और उग्र होते हैं .मुसलमान जैसे ही कुरआन खोलता है अक्ल के दरवाज़े बंद कर देता है .मुसलमान परम्परावादी हैं .इनकी एक परम्परा हर जगह बिस्मिलाह लिखने और बोलने की है .यह पूरी आयत इस तरह है “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिराहीम “सूरा नम्ल-27 :30 इसका अर्थ है अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपालु है .

इस्लाम से पाहिले अरब में यहूदी धर्म का प्रभाव था . लोग दयालु और कृपालु खुदा को नहीं जानते थे.तौरेत में खुदा के बारे में यह लिखा है –

“मैं तेरा खुदा यहोवा हूँ ,मैं जलन रखने वाला खुदा हूँ ,जो मुझ से बैर करेगा मैं उससे ,उसके बेटों ,पोतों ,परपोतों और पितरों को दंड दूँगा ”

बाइबिल –निर्गमन -अध्याय 20 :आयत 5 .यही विचार अरबों के भी थे .इसी कारण से जब सन 628 में कुरेश और मुहम्मद के बीचएक लिखित संधि हुई थी तो उसमे “बिस्मिलाह “आयत की जगह “बिस्मिक अल्लाहुम्म “यानी अल्लाह के नाम से .क्योंकि उस समय रहमान और रहीम शब्द का कोई वजूद नहीं था .यह बाद में आया है .उस संधि पत्र हज़रत अली ने लिखा था .कुरैश की तरफ से “सुहैल बिन अमरू “और मुसलमानों की तरफ से मुहम्मद ने हस्ताक्षर किये थे .इस संधिपत्र को “बयतुल रिजवान “कहा जाता है .यह संधि दस साल के लिए थी.इसके बारे में कुरआन में सूरा फतह में 48 :आयत 1 से 29 तक पूरा विवरण दिया गया है.उसी दौरान कुरआन की सूरा तौबाह 9 नाजिल हुई .यह कुरआन की एकमात्र सूरा है जिसमे “बिस्मिल्लाह “की आयत नहीं दी गयी है
.

रहमान और रहीम की कल्पना बाइबिल से ली गयी है .यरूशलेम के राजा सुलेमान ने अपने राजतिलक के समय पडौस के राज्य नूबिया की रानी बलकीस को निमंत्रण पत्र भिजवाया था .नूबिया को “शेबा “भी कहा जाता है .जब सुलेमान का पत्र रानी के दरबार में पहुंचा तो दराबारिओं ने रानी से पूछा कियह पत्र किसकी तरफ से आया है .रानी ने कहा कि यह पत्र ऐसे राजा की तरफ से आया है जिसका ईश्वर “अत्यंत दयालु और मेहरबान “है .देखिये बाईबिल -1 राजा अध्याय 10 आयत 1 से 10 तक .यही बात कुरआन की सूरा नम्ल 27 :30 में दी गयी है

कुरआन में सिर्फ इसी सूरा में बिस्मिल्लाह की पूरी आयत दी गयी है .और सूरा हूद 14 :41 में केवल बिस्मिलाह शब्द दिया गया है

सब जानते हैं कि कुरआन 23 सालों में थोड़ा थोड़ा नाजिल हुआ था.वर्त्तमान कुरआन में सूरतों की तरतीब नजूल के हिसाब से नही है .हम सूरतों के नाजिल होने का क्रम कुछ सूरतें दे रहे हैं .पूरी लिस्ट किसी भी साईट से मिल सकती है .नुजूल के हिसाब से पहली पांच सूरतें इस प्रकार हैं .इनके सामने इनका कुरआन में वर्तमान क्रम दे रहे हैं 1 अलक 96 ,2 कलम 68 ,3 मुज्जम्मिल 73 , 4 मुदस्सिर ७४ ,5 फातिहा 1 .

अर्थात कुरआन कि जो पहिली सूरत फातिहा है उसका नुजूल का क्रम पांचवा है .कुआं में कुल 114 सूरते है .जो भी सूरत नाजी हुई थी किसी में भी बिस्मिलाह की आयत नहीं थी .कुरआन का पहिला शब्द इकरा था सूरा 96 .कुल 114 सूरतों में सूरा तौबह में बिस्मिल्लाह की आयत नहीं है और सूरे नम्ल के अन्दर पूरी आयत है .यानी बाद में कुरआन की हरेक सूरत के पाहिले बिस्मिल्लाह की आयात लिख दी गई .इस तरह कुरआन में वास्तव में जितनी आयतें थीं उनमे 112 आयतें अधिक जोड़ दी गयीं .यानी कुरआन में तहरीफ़ हुई है.इसका कोई प्रमाण मुसलमानों के पास नहीं हैं कि अल्लाह ने हरेक सूरत के पाहिले बार बार बिस्मिल्लाह की आयत नाजिल की थी .या ऐसा कोई हुक्म दिया था कि हरेक सूरत के पाहिले बिस्मिलाह की आयत लिखी जाये .

इस के बारे में मुस्लिम विद्वानों और इमामों ने यह विचार प्रकट किये है –

“हर सूरत में बिस्मिलाह कुरआन का हिस्सा नहीं है’इमाम हनीफा ,इमाम मालिक -कन्जुल उमाल खंड 7 पेज 437 .

इमाम मालिक और औजाई कहते है कि बिस्मिल्लाह कुरआन का हिसा नहीं है .सिर्फ जो सूरा नम्ल में है .इसलिए रमजान के महीने को छोड़कर बिस्मिल्लाह न तो जोर से पढ़ें और न मन में पढ़ें .तफ़सीर कशफ़ खंड 1

इमाम शुयूती मानते हैं कि जो कुरआन में कुछ भी बढ़ाएगा वह काफिर है, तफ़सीर अल सगीर खंड 2 पेज 32

इस तरह तफसीर कबीर में अनुसार वर्त्तमान सारे सुन्नी मुसलमान काफिर हैं क्योंकि इन लोगों ने उस समय कुरआन में 112 आयतें बढ़ा दीं

हम प्रमाण के लिए इस्लाम के धर्म गुरुओं और इमामों के इस विषय पर दिए गए फैसले प्रस्तुत कर रहे हैं –

The Hanafi and Maliki belief that “Bismillah al-Rehman al-Rahim” is not a part of the Quran

Before we proceed any further, let us first cite an unequivocal edict of Holy Prophet [s] regarding “Bismillah al-Rehman al-Rahim” being one of the verses of Holy Quran:

Abu Huraira narrated that the prophet said: ‘If anyone recited (Surah) al-Hamd, he shall recite ‘Bismillah al-Rahman al-Rahim’ because it is the head of Quran, the head of the book and the Sab’e al-Mathani (seven verses) and ‘Bismillah al-Rahman al-Rahim’ is part of its verses’

Tafseer Khazin, Volume 1 page 12, Muqqadmah

“Imam Abu Hanifa, Imam Malik and Imam Auzai attested that neither is “Bismillah” a part of surah Fatihah, nor of any other surah of the Quran”

If according to Imam Abu Hanifa “Bismillah al-Rehman al-Rahim” (In the name of Allah, the Beneficent, the Merciful) is not a part of any Quranic Surah then the Sunni ulema have committed an addition to the Quran when writing “Bismillah” at 114 places. If making an addition or deletion from the Quran is kufr then either Abu Hanifa is kafir or the present day Sunnis are kafir. The Nawasib of Sipah e Sahaba need to declare Abu Hanifa and abandon his taqleed forthwith.

We read in Tafseer Kabeer:

وأما أبو حنيفة رحمه الله تعالى فإنه قال : بسم الله ليس بآية منها

While Abu Hanifa may Allah’s mercy be upon him said: ‘Bismillah is not a verse of it’

Other that the month of Ramadhan, “Bismillah” shouldn’t be recited in any prayer neither on ones heart nor loudly

Imam Fakhruddin Razi writes in Tafseer Kabeer, Volume 1 page 151:

وقال مالك والأوزاعي رضي الله تعالى عنهما : إنه ليس من القرآن إلا في سورة النمل ، ولا يقرأ لا سراً ، ولا جهراً إلا في قيام شهر رمضان

“Imam Malik and Auzai may Allah be pleased with both of them said: ‘It (Bismillah) isn’t a part of the Quran except Surah Naml and that other than in Ramadhan, it should not be recited, neither in ones heart nor aloud”

Imam Abu Hanifa, Imam Malik and Imam Auzai attested that neither is “Bismillah” a part of surah Fatihah, nor of any other surah of the Quran”

If according to Imam Abu Hanifa “Bismillah al-Rehman al-Rahim” (In the name of Allah, the Beneficent, the Merciful) is not a part of any Quranic Surah then the Sunni ulema have committed an addition to the Quran when writing “Bismillah” at 114 places. If making an addition or deletion from the Quran is kufr then either Abu Hanifa is kafir or the present day Sunnis are kafir. The Nawasib of Sipah e Sahaba need to declare Abu Hanifa and abandon his taqleed forthwith.

We read in Tafseer Kabeer:

وأما أبو حنيفة رحمه الله تعالى فإنه قال : بسم الله ليس بآية منها

While Abu Hanifa may Allah’s mercy be upon him said: ‘Bismillah is not a verse of it’

The Ulema of Ahle Sunnah believed that the sole reason that “Bismillah” was written in the Quran was to make a distance between the texts and to earn a blessing

We read in Tafseer Kashaf:

इस से साफ़ साबित हो गया है कि मुसलमान जो चेलेंज करते हैं कुरआन में न तो कुछ घटाया गया है न बढाया गया है .वह वह दावा झूठ है .और 114 बढ़ाना क्या तहरीफ़ नहींतो क्या है