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देशद्रोहियों और आतंकियों को खुश होना चाहिए कि उन्हें भारत में एक नया पैरोकार मिल गया है। पैरोकार भी ऐसा-वैसा नहीं है। काग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह जैसा है। वही दिग्विजय सिंह, जिन्हें युवराज राहुल गाधी का सबसे भरोसेमंद सेनापति और दस जनपथ की जुबान समझा जाता है। पर काग्रेस के इस सेनापति के दिल में मुंबई बम विस्फोट में मारे गए लोगों के प्रति तनिक भी संवेदना नहीं है। अन्यथा, वह लाशों पर सियासत करने का दुस्साहस नहीं दिखाते।

घटना में मारे गए लोगों की चिता अभी ठंडी भी नहीं हुई है कि दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिंदू संगठनों को लेकर बयानबाजियां करना शुरू कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि मुंबई आतंकी घटना में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी दावा किया है कि उनके पास अन्य आतंकी गतिविधियों में संघ की संलिप्तता के सबूत हैं। विचित्र लगता है कि जिन जाच एजेंसियों को काफी मशक्कत के बाद भी अभी तक कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लगा, उस घटना के लिए दिग्विजय सिंह आरएसएस और हिंदू संगठनों को किस बिना पर जिम्मेदार ठहरा रहे हैं?

पूछा जा सकता है कि अगर उनके पास कोई सबूत है तो वे क्यों नहीं जाच एजेंसियों को उपलब्ध करा देते हैं? बगैर किसी सबूत के राष्ट्रवादी संगठनों पर देशद्रोह जैसे आरोप जड़ना क्या राजनीतिक नीचता की हद नहीं है?

आखिर दिग्विजय सिंह को यह अधिकार किसने दे रखा है कि वे जब चाहें तब किसी भी संगठन को आतंकी गतिविधियों में संलिप्त बता दें और आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों की पैरोकारी करते फिरें।

सच तो यह है कि दिग्विजय सिंह के पास संघ और अन्य हिंदू संगठनों के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। पर वे जानबूझकर राजनीतिक वितंडा खड़ा करने की कोशिश इसलिए कर रहे हैं कि सरकार की नाकामियों पर परदा गिरा रहे। दिग्विजय सिंह का शिगूफा और अघोरतम आचरण उनके दिमागी दिवालियेपन को उजागर करने के लिए काफी है। पर हैरत होती है कि काग्रेस पार्टी अपने इस बड़बोले दरबारी के बुद्धि-चातुर्य पर लट्टू हुई जा रही है।

याद होगा पिछले दिनों ही दिग्विजय सिंह ने वाक्जुगाली की थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शह पर होने वाली कथित आतंकी गतिविधियों के बारे में उन्हें अपनी पार्टी को समझाने में तीन से चार साल लग गए। तो क्या अब यह माना जाए कि काग्रेस पार्टी अपने इस नए पाखंडी गुरु की राजनीतिक शिक्षा पर अमल करना शुरू कर दिया है?

क्या दिग्विजय की तरह काग्रेस पार्टी भी इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि हर आतंकी घटना के लिए संघ और हिंदू संगठन ही जिम्मेदार हैं? हिंदू संगठनों पर जिस तरह दिग्विजय सिंह हमलावर हैं और काग्रेस पार्टी मौन साधे हुए है, उसे देखकर तो कुछ ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। 13/7 की आतंकी घटना पर दिग्विजय सिंह के कुत्सित बयान पर काग्रेस का यह कहना कि दिग्विजय सिंह कुछ भी गलत नहीं कह रहे हैं, आखिर क्या प्रतिध्वनित करता है?

मतलब साफ है कि दिग्विजय सिंह और काग्रेस दोनों की बुनियादी सोच आतंकवाद पर एक ही है, लेकिन काग्रेस और दिग्विजय सिंह इस सवाल से नहीं बच सकते हैं कि जब जाच एजेंसिया किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची हैं तो ऐसे में दिग्विजय सिंह संघ और हिंदूवादी संगठनों पर हमला बोलकर आखिर किसकी मदद कर रहे हैं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि काग्रेस पार्टी दिग्विजय सिंह के मार्फत अनर्गल बयान दिलवाकर जाच एजेंसियों को गुमराह करने की कोशिश कर रही है? इस संभावना से इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट से फासी की सजा पा चुका संसद का हमलावर अफजल गुरु और 26/11 के आरोपी अजमल कसाब आज भी सरकार के संरक्षण में मौज काट रहे हैं।

तो क्या दिग्विजय सिंह इसी तर्ज पर 13/7 के आरोपियों को भी बचाकर वोट हड़पने की युक्ति भिड़ा रहे हैं? इस बात की निष्पक्ष जाच होनी ही चाहिए कि आखिर दिग्विजय सिंह किन लोगों के हाथों में खेल रहे है? पिछले दिनों आतंकी घटनाओं में संलिप्त बताकर गिरफ्तार की गई प्रज्ञा सिंह ने जोर देकर कहा था कि देश में होने वाली हर आतंकी घटनाओं में दिग्विजय सिंह का हाथ रहता है और वह आतंकियों से मिले हुए हैं।

प्रज्ञा सिंह की इस टिप्पणी पर भले ही देश ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन दिग्विजय सिंह के खुराफाती दिमाग के कमाल को देखते हुए साध्वी प्रज्ञा सिंह के खुलासे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस बात से कतई संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है कि दिग्विजय सिंह संघ और हिंदू संगठनों पर इसलिए हमला बोल रहे हैं कि एक खास समुदाय के लोगों को अपने पाले में खड़ा करना चाहते हैं। यह ओछी हरकत दिग्विजय सिंह के राजनीतिक उद्देश्य का एक छोटा पड़ाव हो सकता है, लेकिन चरम लक्ष्य बिल्कुल ही नहीं। दिग्विजय सिंह का उदेश्य इससे भी ज्यादा घातक और अमानवीय है।

अक्सर देखा जाता है कि जब भी देश में कोई बड़ा आतंकी हमला होता है दिग्विजय सिंह की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। जाच एजेंसिया किसी निष्कर्ष पर पहुंचें, इससे पहले ही दिग्विजय सिंह संघ और हिंदू संगठनों को बदनाम करना शुरू कर देते हैं। ऐसे में उनकी राष्ट्रभक्ति को लेकर स्वत: संदेह उत्पन होने लगता है। वे संवैधानिक संस्थाओं में भी संघ विचारधारा से जुड़े लोगों की तथाकथित उपस्थिति को लेकर संदेह जताते देखे जाते हैं।

दिग्विजय सिंह न तो केंद्र सरकार में मंत्री हैं और न ही जाच एजेंसिया ही उनके अधीन काम करती हैं। फिर भी वे आतंकी घटनाओं के निष्कर्ष की भविष्यवाणी कैसे कर देते हैं, यह बात समझ से परे लगती है? क्या भारत सरकार ने उन्हें संविधानेत्तर शक्तिया दे रखी हैं या वे देश के जाने-माने जासूस हैं?

अगर मनमोहन सरकार और दस जनपथ अपने सेनापति की इस देशतोड़क बयानबाजी पर लगाम नहीं कसती है तो मानने में कोई हर्ज नहीं कि वे भी इस खतरनाक साजिश में परोक्ष रूप से शामिल हैं। ऐसे में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी अगर आरोप जड़ती है कि दिग्विजय सिंह सोनिया और राहुल की सहमति से विष उगल रहे हैं तो इसे अनुचित कैसे कहा जा सकता है?

मौन होना स्वीकारोक्ति का ही दूसरा नाम है। सरकार और दस जनपथ दोनों ही दिग्विजयी मौन साध रखे हैं।