Tags


गुजरात का छठवां सुल्तान महमूद बेगड़ा बड़ा क्रूर, निर्दय, धर्म द्रोही और दुर्दान्त शासक था। वह भयंकर हिन्दू विरोधी था। इसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया। यह ऐसा भोजन भट्ट था कि इसके खाने की मात्रा को लेकर पूरे देश में अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हो गई थीं। प्रसिद्ध उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा के अनुसार वह १५० केले, एक सेर मक्खन और एक सेर शहद तो जलपान में ही लेता था और पूरे दिन में लगभग एक मन अन्न खाता था। इसी महमूद बेगड़ा ने पावागढ़ और जूनागढ़ के किले जीत लिए।

इन दोनों स्थानों और अपनी सेना के मार्ग में पड़ने वाले हिन्दू मंदिरों को उसने तोड़ डाला। निर्ममतापूर्वक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया और फिर उसकी सेना पालीताणा की ओर बढ़ने लगी। पालीताणा में जैनों का प्रसिद्ध तीर्थराज शत्रुंजय स्थित है। बेगड़ा उसी विशाल मंदिर को तोड़ने आ रहा था।

पालीताणा के लोगों तक यह समाचार पहुँचा तो वे काँप गए। जैनों की एक बड़ी सभा हुई। शत्रुंजय को बचाने के उपाय सोचने लगे परन्तु उस दुर्दान्त आततायी के हाथों मंदिर को बचाने का कोई उपाय समझ में नहीं आया। जैन समाज किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। किसी बुद्धिमान जैन सज्जन ने कहा कि अब तक इस संकटकाल में शत्रुंजय की रक्षा केवल पालीताणा के ब्रह्मभट्ट ही कर सकते हैं। पालीताणा के ब्रह्मभट्ट बड़े धर्मप्राण, विद्वान्‌, संघर्षशील और हठी के रूप में प्रसिद्ध थे। जैन समाज के सभी संभ्रान्त जनों ने ब्रह्मभट्टों की शरण ली और उनसे अपने तीर्थराज को बचाने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि इस आततायी सुल्तान की सेना के सम्मुख हम जैन असहाय हैं। आप जैसे विद्वान्‌ और धर्मरक्षक हमारे तीर्थ की रक्षा कीजिए।

ब्रह्मभट्टों ने उन्हें शत्रुजय की रक्षा का वचन दिया और सबसे वृद्ध ब्रह्मभट्ट ने उन्हें धर्म पर अपना बलिदान करने को प्रेरित किया। अहिंसक विरोध के द्वारा तीर्थराज की रक्षा का निश्चय हुआ क्योंकि रक्तलोलुप, धर्मद्रोही, क्रूर सेना का सशस्त्रु विरोध कोई अर्थ नहीं रखता था।

दूसरे दिन निश्चित समय पर पालीताणा के एक हजार ब्रह्मभट्ट शत्रुंजय की तलहटी में एकत्रु हुए। प्रत्येक बलिदानी ब्रह्मभट्ट श्वेत अंगरखा पहले चंदन चर्चित भाल और गले में रुद्राक्ष की माला धारण किए था। सबकी कटि में कटारें थीं। सुल्तान बेगड़ा को इन दृढ़ निश्चयी ब्रह्मभट्टों के तलहटी में एकत्रु होने का समाचार मिल गया।

अब बिना मंदिर तोडे आगे बढ़ना उसे अपना अपमान लगा। वह सेना सहित तलहटी में पहुँचा। सबसे आगे घोड़े पर सवार बेगड़ा मंदिर की सीढ़ियों के नीचे तक चला आया। सर्वाधिक वृद्ध ब्रह्मभट्ट ने आगे बढ़कर उसकी प्रशंसा की और उससे ब्रह्मभट्टों के सम्मान की रक्षा का आग्रह किया परन्तु धर्मद्रोही बेगड़ा इसे सुनकर और अधिक क्रोधित हो गया। उसने सैनिकों को उस वृद्ध को घसीट कर रास्ते से हटाने का आदेश दे दिया।

सिपाही आगे बढ़े परन्तु जब तक वे उस पवित्र वृद्ध का शरीर छूते उसने ÷जय अम्बे’ का वज्रघोष किया और कमर से कटार निकालकर अपने पेट में घोंप ली। रक्त का फव्वारा फूट पड़ा और खून की कुछ बूंदे सुल्तान के चेहरे पर भी पड़ीं। उस हुतात्मा के मृत शरीर को बगल में छोड़कर सुल्तान आगे बढ़ने को तत्पर हुआ तभी अगली सीढ़ी पर खड़े दूसरे ब्रह्मभट्ट ने ‘जय अम्बे’ का प्रचण्ड उद्घोष कर कटार निकाल कर अपने पेट में घोंप ली। सुल्तान एक बार तो हतप्रभ रह गया और उसकी गति रुक गई।

वजीर ने उसे ब्रह्मभट्टों की धर्मप्राणता और हठधर्मिता के विषय में समझाया। परन्तु अपने मुल्ला-मौलवियों का रुख देखकर सुल्तान मानने को तैयार नहीं हुआ। उसका अनुमान था कि दो-चार लोगों के मरने पर ब्रह्मभट्ट भयभीत होकर वहाँ से चले जाएंगे। वह आगे बढ़ा परन्तु तीसरी सीढ़ी पर एक कोमल कमनीय काया, कामदेव के सौन्दर्य को अपनी सुन्दरता लजाने वाला हँसता हुआ दृढ़ निश्चयी षोडष वर्षीय किशोर खड़ा था।

सुल्तान जब तक उसके पास पहुँचे उसने ‘जय अम्बे’ का उद्घोष किया और कटार पेट में घोंप ली। उसके गर्म रक्त से सुल्तान सिर से पाँव तक नहा गया।यह अकल्पनीय दृश्य देखकर सुल्तान महमूद बेगड़ा का कलेजा हिल गया। वह भीतर तक काँप गया। इन हुतात्माओं की आत्माहुति ने उसे झकझोर दिया। वह पीछे लौटा और उसने अपने सरदारों को आदेश दिया कि मार्ग में खड़े सभी ब्रह्मभट्टों को कैद कर लिया जाए।

सुल्तान का आदेश का पालन करने के लिए उसका सरदार खुदाबन्द खान जैसे ही आगे बढ़ा कि एक सत्तर वर्षीय वृद्ध ने कटार से अपना पेट चीर डाला और अपनी आँतों की माला खुदाबन्द खान के गले में डाल दी। बौखलाकर सरदार ने माला अपने गले से उतार दी और अगली सीढ़ी पर खड़े जवान को पकड़ने को आगे बढ़ा। जब तक खुदा बन्दखान उसके पास पहुँचे कि उसने वज्रनिनाद में ÷जय अम्बे’ का घोष किया और कटार अपने पेट में घोंप ली।

अब स्थिति यह हो गई कि ज्यों ज्यों बौखलाकर खुदाबन्द खान अगली सीढ़ी की ओर बढ़ता कि वहाँ खड़ा ब्रह्मभट्ट कटार से अपनी आत्माहुति दे देता था। इस तरह ८ लोगों ने बलिदान कर दिया। ब्रह्मभट्टों के इस रोमांचकारी अकल्पनीय आत्म बलिदान को देखकर खुदाबन्द खान भी काँप गया। वह पीछे लौटा और उसने सुल्तान बेगड़ा से लौट चलने की प्रार्थना की। क्रोधित और दिग्भ्रमित सुल्तान ने अपने खूंखार, निर्दयी और पाशविक वृत्तियों वाले सैनिकों को छाँटकर सभी ब्रह्मभट्टों को मारने का आदेश दिया। अब शत्रुजय की सीढ़ियों पर ‘भूतो न भविष्यति’ जैसा महान्‌ दृश्य था। महमूद के सैनिक जिस सीढ़ी के पास पहुँचते उसी पर खड़ा ब्रह्मभट्ट ‘जय अम्बे’ का तुमुलनाद कर आत्माहुति दे देता।

इन वीर हुतात्माओं के इतने शव देखकर सुल्तान बेगड़ा घबरा गया। उसी समय एक ग्यारह वर्षीय सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति वहाँ आई और उसने सुल्तान बेगड़ा की भर्त्सना करते हुए उसे धिक्कारा। उसने कहा! दुरात्मा महमूद तू तो गुजरात का पालक था फिर तू ही घातक कैसे बन बैठा। तूने अपनी धर्मप्राण जनता के खून से अपना कुल कलंकित कर लिया। यदि अभी भी तेरी प्यास नहीं बुझी तो देख एक हजार पालीताणा के और हजारों की संख्या नीचे तलहटी में खड़े ब्रह्मभट्ट अपना बलिदान देने को तत्पर खड़े हैं।

ऐसा कहते-कहते उस बालिका ने ‘जय अम्बे’ का जयघोष करके अपने हाथों से अपना मस्तक उतार कर फेंक दिया। इस असीम साहस की प्रतिमूर्ति नन्हीं बालिका की आत्माहुति देखकर सुल्तान काँप गया। उसके साहस ने जवाब दे दिया। उसने काँपते कण्ठ से अल्लाह से अपने अपराध की क्षमा याचना की और सेना को लौट चलने का हुक्म दिया। उसी दिन से महमूद बेगड़ा ने अपने राज्य मे किसी भी धर्म के धार्मिक स्थल को नष्ट करने पर प्रतिबंध लगा दिया।

शत्रुंजय तीर्थराज में १०७ ब्रह्मभट्टों और एक कुमारी ने स्वेच्छा से आत्माहुति दी थी। उसी दिन से जैन समाज ने शत्रुजय की फरोहिती पालीताणा के ब्रह्मभट्टों को सौंप दी। शत्रुंजय का यह तीर्थराज आज भी हुतात्मा ब्रह्मभट्टों की जयकथा कह रहा है।